Thursday, July 25, 2019

खेल

क्षण
विशाल वृक्ष सा
अथाह ब्रह्म में
फैलाए अनगिनत
टहनियां

समय
अनवरत टहनियों सा
बिखेरता स्मृतियों के
तिनके

तिनके समेट
तनिक तनिक
तन-घोसला बनाती
रूह

खेल
खेल रहे
निरंतर
रूह
और
ब्रह्म

मुश्किल

हम पहले मिलते थे
तो मैं डर जाता था

फिर मुलाकातें बढ़ीं
और दोस्ती हो गई
मै तुझसे, तू मुझसे
मजाक करने लगी

ऐ मुश्किल
अब मैं तेरा महबूब हूँ
तेरे बिना नहीं कटता
एक पल भी
मुश्किल से

Friday, May 10, 2019

पतन

दिनोंदिन
गिर रहा है
वो आदमी

बनना है
खुदा जो उसे

Tuesday, May 7, 2019

ख्वाहिश





ख्वाहिश है

आँख लगे

बतियाते हुए

चाँद से 


और

आँख खुले

एक पीली चादर 

की छांव में

Friday, April 12, 2019

गुमान

गुमान हुआ
दो लहरों को

मैं भिन्न
मैं बेहतर

दोनों
पानी हो गईं

साया

रोशनी में
छोटा हो
छुप जाता है
मुझमें

अंधेरे में
चादर सा
छुपा लेता है
मुझको

मेरा साया
कुछ कुछ
मेरी माँ
जैसा है

Sunday, April 7, 2019

सचमुच

प्रतिदिन
उदय और अस्त
होता सूर्य
रंग बिखेरता है
नभ पर

पर क्या सूर्य
उदय या अस्त
होता है सचमुच

क्या सूर्य ही
बिखेरता है
रंग सचमुच

क्या होता है
नभ सचमुच
और क्या होता है
वह रंग सचमुच

दस्तक

दस्तक देता रहता है कि सुन सके अपनी ही दस्तक "मैं" मैं को शक है अपने होने पर मैं को भय है अपने न होने का