धर्म मजहब बाँटता
कपड़ों से आदमी भाँपता
यहाँ तो चाँँद भी ढका है
सुना है कहीं सूरज उगा है
कपड़ों से आदमी भाँपता
यहाँ तो चाँँद भी ढका है
सुना है कहीं सूरज उगा है
मजदूर रास्ते नापता
किसान पैबंद टाँँकता
यहाँ तो चाँँद भी ढका है
सुना है कहीं सूरज उगा है
किताब
जादूगरनी है
मुझसे पहले
पढ़ लेती है
मुझे
किताब
चापलूस है
सुनाती हमेशा
पसंदीदा कहानी
मुझे
किताब
आँधी है
झकझोरती
गहरी नींद से
मुझे
किताब
माँ है
मरहम लगाकर
सुला देती
मुझे
किताब
केवल है
कोरी, निःशब्द
लिख रही
मुझे
दस्तक देता रहता है कि सुन सके अपनी ही दस्तक "मैं" मैं को शक है अपने होने पर मैं को भय है अपने न होने का