चाहा बिखेरें रौशनी इस शहर में
खबर क्या उन्हें है अँधेरे की लत
शीशा बदल कर जो इतरा रहे हैं
नवाक़िफ़ न ऐसे बदलती है सूरत
छुपाये हैं धब्बे चमक से पराई
शातिर है चंदा छलावे की मूरत
(11-Oct-14)
दस्तक देता रहता है कि सुन सके अपनी ही दस्तक "मैं" मैं को शक है अपने होने पर मैं को भय है अपने न होने का
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