Sunday, July 27, 2014

दरारें

अभी तो हटाई थी हमने फफूंदी
है मरहम दरारों पर ताज़ा अभी
फ़िर क्यों चटखने लगी हैं दीवारें


क्यों सहमी खड़ी है हवाएँ शहर की
पंछी दरख्तों से
घबराए है क्यों
फिर से जलाई है चिंगारी किसने

Friday, July 25, 2014

कसक

#१

मुस्कराते हैं क्यों ये ज़रुरत से ज्यादा
इन होठों का भी कुछ ईमान तो होगा

#२

बयाँ है अलग सा उन आँखों के नीचे
कसक झांकती है ठहाकों के पीछे

साथी

करे न करे हमको शामिल ख़ुशी में
पर आएंगे ग़म में तेरे बिन बुलाये


रहें ना रहें गर अंधेरों में साये
जुगनू मिलेंगे रास्तों को सजाये



Wednesday, July 23, 2014

राख

मरघट की राख
मरे हुए इंसान की
या मारे हुए पेड़ की

शायद पेड़ की राख
क्योंकि थी अशांत
नहीं समझ पाई क्यों 
मारा जलाया उसे
अकारण

या थी इंसान की आँख
क्योंकि थी अशांत
नहीं समझ पाई क्यों 
जलाया उसे अकारण 
वरना देती रोशनी
किसी नेत्रहीन को

Monday, July 21, 2014

सच

देखा सुना सब है माया
सच सुविधा का है जाया

पेड तोता

जंगल
जंगल में तोता
उन्मुक्त तोता
पर खाता दाना
मालिक का

जंगल
जंगल में पेड़
पेड़ गिरा
तोते ने देखा
गिरे पेड़ को
फिर मालिक को
कुल्हाड़ी लिए

जंगल
जंगल में टीवी
टीवी पर
तोते ने कहा
नहीं गिरा पेड़
था ही नहीं पेड़

जंगल
जंगल में बंदर
रहता था
पेड़ पर
वही पेड़ जो
था ही नहीं

जंगल
जंगल में प्राणी
बन्दर कूदा
कहा पेड़ तो था
कहा "पेड तोता"
तोता बोला
स्वाँग है

जंगल
जंगल में जज
मालिक बोला
हुई मानहानि
बंदर अंदर

जंगल
जंगल में तोता
उन्मुक्त तोता

Saturday, July 19, 2014

सय्यम

साँसों की मज़बूरी या आँखों की खुद्दारी
आँसू का बहना गवारा नहीं

सजाया है दर्द भी इनाम की तरह
ठुड्ढी का हिलना गवारा नहीं

दस्तक

दस्तक देता रहता है कि सुन सके अपनी ही दस्तक "मैं" मैं को शक है अपने होने पर मैं को भय है अपने न होने का