वो हँसे, मेरी नासमझी मजाक बन गई
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दस्तक
दस्तक देता रहता है कि सुन सके अपनी ही दस्तक "मैं" मैं को शक है अपने होने पर मैं को भय है अपने न होने का
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दस्तक देता रहता है कि सुन सके अपनी ही दस्तक "मैं" मैं को शक है अपने होने पर मैं को भय है अपने न होने का
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जो लिखा सो सही सच वो पूरा पर नहीं दे रहा इस पल जो दस्तक उसकी तो पुस्तक नहीं तू ठहर हो शांत साक्षी तुझ सिवा तो कुछ नहीं
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इस साल कुछ पाना नहीं है खोज लेना है बस गुमशुदा खुद को। इस साल कहीं जाना नहीं है लौट आना है बस यहाँ, अभी। इस साल कुछ बनना नहीं है ...
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