भूत भविष
भाव भावना
भय औ भव के
भ्रम जाल में
ढक रखा है
राहु ने
सूरज को
भाव भावना
भय औ भव के
भ्रम जाल में
ढक रखा है
राहु ने
सूरज को
अपना ओज
निखार
राहु को
राख कर
जल उठना
यही सूरज का
धर्म है
निखार
राहु को
राख कर
जल उठना
यही सूरज का
धर्म है
दस्तक देता रहता है कि सुन सके अपनी ही दस्तक "मैं" मैं को शक है अपने होने पर मैं को भय है अपने न होने का