कुश,
कुश पर पिंड
पिंड पर तिल,
पुष्प, जल, भोग
अर्पित कर
सविधि श्राद्ध किया
"मैं" का
मैंने
कुश पर पिंड
पिंड पर तिल,
पुष्प, जल, भोग
अर्पित कर
सविधि श्राद्ध किया
"मैं" का
मैंने
हे प्रभु
"मैं" की
मुक्ति हो
और केवल
"हूँ" ही हो
समय का सृष्टि से,
सृष्टि का सृजन से,
सृजन का स्त्रोत से,
स्त्रोत का सत्य से,
सवाल है।
होने और
होने के एहसास
के बीच का पुल
सवाल है।
होने का अर्थ
सवाल के हल में नहीं,
हल की खोज में है।
होने का अर्थ
हर हल में निहित
अगले सवाल और
अगली खोज में है।
#१
धूप धूल
पग शूल छिली
सतत अथक
अनवरत् चली
अब लो ठहर
तुम एक पहर
पोंछ घाम
कुछ लो विराम
खुद को निहार
लो खुदी निखार
कुछ हुनर सँवार
करो खुद से प्यार
एक नई डगर
अब नया सफर
अपनी ही लौ
हो जा प्रखर
अपनी ही लौ
हो जा प्रखर
दस्तक देता रहता है कि सुन सके अपनी ही दस्तक "मैं" मैं को शक है अपने होने पर मैं को भय है अपने न होने का