Sunday, August 2, 2015

इंसाँ

मेरा बनाया इंसाँ
इतना हुआ क्यों शातिर
तोड़े मेरी मस्जिद
मेरे मंदिर की खातिर

छल नीति

कुछ फतवा के दम पर जीते
कुछ का भगवा भारी
छलें धर्म के छद्म भाव से
सत्ता लोलुप बारी बारी

Tuesday, July 28, 2015

कलाम सर को सलाम

ज्ञान ध्यान लौ प्रज्वल
मृदुभाष नम्र अति सरल

धरा सपूत सलाम है
गगन तेरा कलाम है

#RIP #APJAK

Saturday, April 4, 2015

मेरे शहर का विकास

वन था यहाँ वृक्ष थे
थे अदद पंजों के निशान
अब धुआँ धूप है
हैं अहम से ऊँचे मकान


सीमेंट गारा धूल है
पवन वातानुकूल है
ओढ़े कोहरा आकाश
मेरे शहर का विकास

Monday, March 30, 2015

मित्र

मित्र रहे मित्र तो वक़्त की मज़ाल क्या
शत्रु बने मित्र तो वक़्त से मलाल क्या

स्वर्ण

खुश हैं वो हो जाऊँगा ख़ाक मैं जल कर
खुश हूँ मैं निखरूँगा आग में तप कर

Saturday, March 7, 2015

रहना है परे

मैं पृथ्वी
मुझे रहना है परे उनसे
जो पचाना चाहते हैं मुझे
और जो बचाना चाहते है

मैं धर्म
मुझे रहना है परे उनसे
जो पचाना चाहते हैं मुझे
और जो बचाना चाहते है

मैं नारी
मुझे रहना है परे उनसे
जो पचाना चाहते हैं मुझे
और जो बचाना चाहते है

मैं ईमान
मुझे रहना है परे उनसे
जो पचाना चाहते हैं मुझे
और जो बचाना चाहते है

दस्तक

दस्तक देता रहता है कि सुन सके अपनी ही दस्तक "मैं" मैं को शक है अपने होने पर मैं को भय है अपने न होने का