ऐ सत्य मैंने देखा है तुम्हें
जीवन की पहली किलकार में
और मृत्यु की ठहरती रफ़्तार में
Monday, July 14, 2014
एक परिभाषा कविता की
मिश्री मीठी तप्त अंगीठी
मरहम लेप कटु आक्षेप
तरल सतह की गूढ़ थाह
अल्प वाक्य अतिशय प्रभाव
मरहम लेप कटु आक्षेप
तरल सतह की गूढ़ थाह
अल्प वाक्य अतिशय प्रभाव
Tuesday, May 13, 2014
जुगलबंदी अभिषेक दुबे के साथ # २
अभिषेक :
काशी तो भइया उनकी, माँ गंगा जिनके साथ,
चाहे हरहर बोल लो, या नमो नमो विश्वनाथ
काशी तो भइया उनकी, माँ गंगा जिनके साथ,
चाहे हरहर बोल लो, या नमो नमो विश्वनाथ
स्वयं :
काश काशी जाते करते श्री नमो स्नान
पाप औ अभिशाप धोते थोथा तज अभिमान
साफ़ नीयत हो तो करती माँ सदा सम्मान
धर्म पर दुष्कर्म करते नासमझ बेईमान
साफ़ नीयत हो तो करती माँ सदा सम्मान
धर्म पर दुष्कर्म करते नासमझ बेईमान
दिनेश अग्रवाल (अभिषेक के मित्र):
नमो को रोने वालो, देखो कजरी का धर्म
थर्ड फ्रंट को सपोर्ट दे ने में ना आ रही शर्म
थर्ड फ्रंट को सपोर्ट दे ने में ना आ रही शर्म
स्वयं :
तय विजय तो अशांति क्यों
क्रान्ति पर यह भ्रान्ति क्यों
चाहे जितना हो प्रबल
झूठ गिरता सिर के बल
जो सहज निश्छल बुलाती माँ उन्हेँ ही हर्ष से
बाकी कतराते हैं डरते गंगा माँ के स्पर्श से
कर चुके दूषित तुझे वो पाप बल औ छल
चली झाड़ू बही गंगा साफ़ अब कल कल
हर हर औ गंगे को करें न दूषित दुष्काज से
है यही विनती नमो औ नमो भक्त समाज से
ना खिले मल में कमल है महज यह आस
हो अमन औ मन मिले हो चहूँमुखी विकास
दोषी दंडित करते खंडित नमो नाम विश्वास
काला धन सींचे जिसे उस वृक्ष से क्या आस
कैसे जागे नीँद का जो रच रहा हो स्वांग
गाड़ सिर को रेत में औ पी नमो की भाँग
अस्सी प्रतिशत धन का जिनके ओर है न छोर
सौ में चालीस दागी दोषी खूनी है या चोर
प्रधान के प्रचार में उद्यम करें निवेश
कब हुए आज़ाद हम अपना कब था देश
आज डीजल दाम उछला कल बढेगी गैस
फ़िक्र क्यों प्रलाप कैसा अब हमारे ऐश
एक प्रधान थे मौन हमेशा घोटालों और स्कैम पर
अब प्रधान भी शांत रहेंगे गैस मुकेश के नाम पर
भक्तों को साष्टांग नमन हैँ चुप जटिल सवाल
पर शुक्र नहीं है बिकनेवाला अपना केजरीवाल
लगे आग डीज़ल औ गैस अच्छे दिन का नारा है
पहले लूट रहे थे विरले अब गिरोह ह्मारा है
नींव निर्बल ढाँचा जर्जर है राजनीति नाकारी
बारी बारी खाया धोखा आशा पर ना हारी
हो सत्य तुम्हारा कथन मित्र औ मिथ्या बात हमारी
चमत्कार को नमस्कार हो अच्छे दिन की बारी
स्वयं :
फैलाया खूब रायता औ खूब मचायी गॅध
कलम को अब विश्राम दें कर ये जुगल बन्द
प्रथम संस्करण
तय विजय तो अशांति क्यों
क्रान्ति पर यह भ्रान्ति क्यों
चाहे जितना हो प्रबल
झूठ गिरता सिर के बल
अभिषेक :
पाप धोते हैं पापी, अधर्म जिनके काज
क्यों छलेगा वो, जो प्रिय सकल समाज!!!
स्वयं :क्यों छलेगा वो, जो प्रिय सकल समाज!!!
जो सहज निश्छल बुलाती माँ उन्हेँ ही हर्ष से
बाकी कतराते हैं डरते गंगा माँ के स्पर्श से
कर चुके दूषित तुझे वो पाप बल औ छल
चली झाड़ू बही गंगा साफ़ अब कल कल
अभिषेक :
माँ के निश्छल स्पर्श को, जो देते राजनिती का नाम,
स्विकार पराजय अपनी, करते भीषण साम दाम
स्वयं :स्विकार पराजय अपनी, करते भीषण साम दाम
हर हर औ गंगे को करें न दूषित दुष्काज से
है यही विनती नमो औ नमो भक्त समाज से
ना खिले मल में कमल है महज यह आस
हो अमन औ मन मिले हो चहूँमुखी विकास
अभिषेक :
नमो समाज एक नाम, जन जन के विश्वास का,
अाश का, आगाज का, विकास के परिभाष का !!
स्वयं :अाश का, आगाज का, विकास के परिभाष का !!
दोषी दंडित करते खंडित नमो नाम विश्वास
काला धन सींचे जिसे उस वृक्ष से क्या आस
अभिषेक :
वह तर्क व्यर्थ होता, जहाँ प्रबल न हो प्रमाण,
वह गर्व व्यर्थ होता, जो दे न सके सम्मान!!
स्वयं :वह गर्व व्यर्थ होता, जो दे न सके सम्मान!!
कैसे जागे नीँद का जो रच रहा हो स्वांग
गाड़ सिर को रेत में औ पी नमो की भाँग
अस्सी प्रतिशत धन का जिनके ओर है न छोर
सौ में चालीस दागी दोषी खूनी है या चोर
अभिषेक :
अब बोलो उसको अवसाद या, बोलो विकट अभिशाप
प्रधान पद विराज गया वो, बिमार करें विलाप
स्वयं :प्रधान पद विराज गया वो, बिमार करें विलाप
प्रधान के प्रचार में उद्यम करें निवेश
कब हुए आज़ाद हम अपना कब था देश
आज डीजल दाम उछला कल बढेगी गैस
फ़िक्र क्यों प्रलाप कैसा अब हमारे ऐश
अभिषेक :
हे ज्ञानी ह्रदय, महापुरुष, मेरा भी मत मान लो,
तजो निराशा, नकारी भाषा, आाशा स्वर भी जान लो,
मैं भी पीड़ित, आप भी पीड़ित काँग्रेस नाम विकार से,
अाअो समृद्धि भी अब देख ले नमो नाम प्रतिकार से !!
स्वयं :तजो निराशा, नकारी भाषा, आाशा स्वर भी जान लो,
मैं भी पीड़ित, आप भी पीड़ित काँग्रेस नाम विकार से,
अाअो समृद्धि भी अब देख ले नमो नाम प्रतिकार से !!
एक प्रधान थे मौन हमेशा घोटालों और स्कैम पर
अब प्रधान भी शांत रहेंगे गैस मुकेश के नाम पर
भक्तों को साष्टांग नमन हैँ चुप जटिल सवाल
पर शुक्र नहीं है बिकनेवाला अपना केजरीवाल
लगे आग डीज़ल औ गैस अच्छे दिन का नारा है
पहले लूट रहे थे विरले अब गिरोह ह्मारा है
नींव निर्बल ढाँचा जर्जर है राजनीति नाकारी
बारी बारी खाया धोखा आशा पर ना हारी
हो सत्य तुम्हारा कथन मित्र औ मिथ्या बात हमारी
चमत्कार को नमस्कार हो अच्छे दिन की बारी
स्वयं :
फैलाया खूब रायता औ खूब मचायी गॅध
कलम को अब विश्राम दें कर ये जुगल बन्द
प्रथम संस्करण
Sunday, May 11, 2014
माँ
#१
साथ नहीं पर पास यहीं
ममता का एहसास वही
है तेरी हर याद काफी
खोजूँ क्यों भगवान कहीं
#२
तब ऊँगली थी राह बताती
पग पग अब भी साया है
साँसे धड़कन सीख दर्शन
सब तुझसे ही पाया है
साथ नहीं पर पास यहीं
ममता का एहसास वही
है तेरी हर याद काफी
खोजूँ क्यों भगवान कहीं
#२
तब ऊँगली थी राह बताती
पग पग अब भी साया है
साँसे धड़कन सीख दर्शन
सब तुझसे ही पाया है
Saturday, May 10, 2014
मंथन
पत्थर पड़े तो ग़म क्यों मीलों पर वो लगेंगे
स्याही पड़ी तो हम वो इतिहास जो रचेंगे
सागर से कह दो भेजे जितनी प्रबल हों लहरें
मंथन नहीं रुकेगा अक्खड़ अड़िग जो ठहरे
स्याही पड़ी तो हम वो इतिहास जो रचेंगे
सागर से कह दो भेजे जितनी प्रबल हों लहरें
मंथन नहीं रुकेगा अक्खड़ अड़िग जो ठहरे
Wednesday, May 7, 2014
आगाज़
पीर ना परिहास से
ना रुके उपहास से
एक अदना आदमी
चल पड़ा विश्वास से
जज़्बा है जज़्बात है
सत्य पथ शुरुआत है
नवचेतना की नींव पर
नवयुगी आगाज़ है
ना रुके उपहास से
एक अदना आदमी
चल पड़ा विश्वास से
जज़्बा है जज़्बात है
सत्य पथ शुरुआत है
नवचेतना की नींव पर
नवयुगी आगाज़ है
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दस्तक
दस्तक देता रहता है कि सुन सके अपनी ही दस्तक "मैं" मैं को शक है अपने होने पर मैं को भय है अपने न होने का
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दस्तक देता रहता है कि सुन सके अपनी ही दस्तक "मैं" मैं को शक है अपने होने पर मैं को भय है अपने न होने का
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जो लिखा सो सही सच वो पूरा पर नहीं दे रहा इस पल जो दस्तक उसकी तो पुस्तक नहीं तू ठहर हो शांत साक्षी तुझ सिवा तो कुछ नहीं
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इस साल कुछ पाना नहीं है खोज लेना है बस गुमशुदा खुद को। इस साल कहीं जाना नहीं है लौट आना है बस यहाँ, अभी। इस साल कुछ बनना नहीं है ...