वृक्षों का भू पर
प्राणी का वन पर
मछली का जल पर
पंछी का नभ पर
दावा नहीं
फिर भी क्या
खुश नहीं वो
मानव कहता
मैं स्वामी
भू का
वन का
जल का
नभ का
फिर भी क्यों
खुश नहीं वो
दस्तक देता रहता है कि सुन सके अपनी ही दस्तक "मैं" मैं को शक है अपने होने पर मैं को भय है अपने न होने का
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