Monday, March 7, 2016

दायरे

अनेकों हैं सृष्टि
अनंत है हर सृष्टि
समेटे है खुद को
क्यों तू दायरों में

बढ़ा अपनी हस्ती
समेटे हर सृष्टि
बन कर तू इंसाँ
बन जा विधाता

Saturday, March 5, 2016

कैद

आदी हो चला है
आईना मेरी सूरत का

कमबख्त टूटता नहीं
और सूरत बदलती नहीं

Saturday, January 9, 2016

अहिल्या

क्यों है हक़ गौतम ऋषि को
क्यों मुझे अभिशाप दें

क्यों इन्द्र को सब देव पूजें
क्यों मेरा अपमान हो
 

क्यों तकूँ मैं राह रघु की
क्यों मेरा "उद्धार" हो

Thursday, January 7, 2016

शुतुरमुर्ग

न जगाओ उन्हें वो जो सोये नहीं हैं
आँखें हैं उनकी अंधेरों की आदी

मिथक मोम से है बने बुत वो जगमग
पिघल जाएंगे धूप सच की पड़ी तो

Friday, January 1, 2016

सत्य

मन चंचल मन शोर है
मन ही शीतल शांत
स्वयं सत्य है सत्य स्वयं
शेष मिथक है भ्रांत

Wednesday, November 18, 2015

विकल्प



ओछे की ओछे से टक्कर, बेबस है मतदाता
एक गाय पर स्वांग रचाता, एक है चारा खाता

Friday, November 6, 2015

धर्म


काटी ली द्रोण ने
उंगली एकलव्य की
दिया श्राप परशुराम ने
शिष्य कर्ण को

दोनों थे गुरुभक्त
दोनों बलशाली
थे दोनों योग्य
शायद अधिक
अर्जुन से भी

क्या धर्म था यही
या जीत जाति की
धर्म पर

दस्तक

दस्तक देता रहता है कि सुन सके अपनी ही दस्तक "मैं" मैं को शक है अपने होने पर मैं को भय है अपने न होने का