Saturday, January 9, 2016

अहिल्या

क्यों है हक़ गौतम ऋषि को
क्यों मुझे अभिशाप दें

क्यों इन्द्र को सब देव पूजें
क्यों मेरा अपमान हो
 

क्यों तकूँ मैं राह रघु की
क्यों मेरा "उद्धार" हो

Thursday, January 7, 2016

शुतुरमुर्ग

न जगाओ उन्हें वो जो सोये नहीं हैं
आँखें हैं उनकी अंधेरों की आदी

मिथक मोम से है बने बुत वो जगमग
पिघल जाएंगे धूप सच की पड़ी तो

Friday, January 1, 2016

सत्य

मन चंचल मन शोर है
मन ही शीतल शांत
स्वयं सत्य है सत्य स्वयं
शेष मिथक है भ्रांत

Wednesday, November 18, 2015

विकल्प



ओछे की ओछे से टक्कर, बेबस है मतदाता
एक गाय पर स्वांग रचाता, एक है चारा खाता

Friday, November 6, 2015

धर्म


काटी ली द्रोण ने
उंगली एकलव्य की
दिया श्राप परशुराम ने
शिष्य कर्ण को

दोनों थे गुरुभक्त
दोनों बलशाली
थे दोनों योग्य
शायद अधिक
अर्जुन से भी

क्या धर्म था यही
या जीत जाति की
धर्म पर

Tuesday, November 3, 2015

तस्वीर


सांझ ढले मेरी आँखों में
तस्वीर सी इक खिंच जाती है
अनदेखी अनजानी सी
टेढ़ी मेढ़ी रेखाओं के जालों सी

खूब वो मन को भाती है जब
इन्द्रधनुष की सतरंगी पोशाकों में
झिल मिल तारों की कुटिया से
वो झांक मुझे मुस्काती है

वसंत पुष्प के अधरों सी
नदिया के निर्झर निनाद सी
भोर किरण की लाली सी
जब मन पर छा जाती है

मैं भाव कुंज में खो जाता हूँ
स्मृति के तारों से झंकृत
गीत वो फिर दोहराता हूँ
गीत वो फिर दोहराता हूँ

(२९ वर्ष पुरानी रचना (१९८५)

Monday, November 2, 2015

भिखारी



भिखारी
ढीठ
माँग रहा था
एक रुपया
वो भी
मंत्री जी से
दुलत्ती खाई
था इसी लायक
भिखारी

मंत्री जी
ढीठ
फिर आयेंगे
माँगने वोट
करेंगे वही सलूक
हम भी
जो करता है
एक भिखारी
दुसरे भिखारी
के साथ

दस्तक

दस्तक देता रहता है कि सुन सके अपनी ही दस्तक "मैं" मैं को शक है अपने होने पर मैं को भय है अपने न होने का