एक बूँद गिरी
पत्ता राख हो गया
शहर में
कहते हैं
आखिरी आँसू था
आखिरी गौरैया का
अब गौरैया नहीं होगी
न ही आँसू गिरेगा
शहर में
Tuesday, December 12, 2017
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दस्तक
दस्तक देता रहता है कि सुन सके अपनी ही दस्तक "मैं" मैं को शक है अपने होने पर मैं को भय है अपने न होने का
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बनने से संभव नहीं है होना होना तो संभव है होने से ही होने की राह नहीं चाह नहीं होने का यत्न नहीं प्रयत्न नहीं होना तो हो रहना...
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कुश, कुश पर पिंड पिंड पर तिल, पुष्प, जल, भोग अर्पित कर सविधि श्राद्ध किया "मैं" का मैंने हे प्रभु "मैं" की मुक्ति हो ...
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फरेब बहाने झूठ मिट रहे हैं धीरे-धीरे आकृतियाँ कहानियाँ शब्द घुल रहे हैं धीरे-धीरे अहम् वहम् फहम से कुछ दूर मिल रहे हैं हम धीरे...