Friday, January 1, 2021

प्रेयसी

राज़ है यह 
मत 
कहना  
किसी से

एक थी
प्रेयसी मेरी
और हम
मिलते थे
हर रोज़

आती थी वो 
राजकुमारी सी
पाँच अश्वों के
तेज रथ पर

बड़ी मेज़ 
लगती थी हमें
वह पाँचों अश्व 
साथ जो बिठाती थी
 
हम उम्र थी
पर बच्चों सी
चंचल, खोई
कहनियों में
और सपनों में

डर से पीली
ईर्ष्या से नीली
क्रोध से लाल
प्यार से गुलाबी  

उसका रंग
बदलता रहता  
हर पल
हर कहानी 
हर सपने पर

और उसके
हिनहिनाते घोड़े
खींच ले जाते
मुझे भी
उन रंगों की
भूलभुलैया में 

पर अब
मोहभंग हो रहा है 
समझने लगा हूँ
जादूगरनी है 
मेरी प्रेयसी

कैद किया था
मुझे अपने 
अश्वों
कहानियाँ
सपनों में

मिलते हैं
हम अब भी
पर डूबता नहीं
मैं उसके रंगों में

देखता रहता हूँ
केवल उसे
शांत 
मुस्कुराते हुए

कम हो रहा है
अब जादू उसका
साथ नहीं लाती है
अपने अश्वों को अब
और थम रही हैं
उसकी कहानियाँ

नहीं होता
पीला नीला 
लाल गुलाबी
उसका चेहरा

अब मैं
उसका प्रेयस
बन रहा हूँ 
और चल रहा है
मेरा जादू

Monday, December 28, 2020

डोर

डोर बँधा
मैं छोर बँधा
लोभ बँधा
मैं क्षोभ बँधा

काट बंध
मैं बहूँ स्वछंद
नित लहर संग
मैं तरल ब्रह्म

Sunday, December 20, 2020

किताब

किताब
जादूगरनी है
मुझसे पहले
पढ़ लेती है
मुझे

किताब
चापलूस है
सुनाती हमेशा
पसंदीदा कहानी
मुझे

किताब
आँधी है
झकझोरती
गहरी नींद से
मुझे

किताब
माँ है
मरहम लगाकर
सुला देती
मुझे

किताब
केवल है
कोरी, निःशब्द
लिख रही
मुझे

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Friday, December 18, 2020

घर

शब्द, सोच
सामान, समझ

सब बाहर
रख दो

फिर आओ
इस घर में

मिलने
खुद से

Friday, December 11, 2020

सड़ांध

ऊंची उठती रही
अहम् भीत 
और मैं 
घटता रहा

छेद किये हैं कुछ
इस दीवार पर अब
और मैं 
उठने लगा हूँ

नाम, जाति, 
धर्म और देश के 
बाँध से थमे 
कुंठित पानी की 
सड़ांध कम हो रही है

और मैं
बहने लगा हूँ 

Sunday, December 6, 2020

घड़ा

घड़ा अनोखा
गढ़ा ये रब ने

भरता जाऊँ
भर ना पाऊँ

तनिक उड़ेलूँ
दरििया पाऊँ

पिल्ला

दौड़ता पहिया
बढ़ जाता है

समय नहीं
कि देखे
अपने कुचले
निरीह पिल्ले को
रक्त उगलते
रुकती सांसों से
प्राण निकलते

पहिया हो गया
इंसान
और इंसानियत
कुचला पिल्ला

दस्तक

दस्तक देता रहता है कि सुन सके अपनी ही दस्तक "मैं" मैं को शक है अपने होने पर मैं को भय है अपने न होने का