मन चंचल मन शोर है
मन ही शीतल शांत
स्वयं सत्य है सत्य स्वयं
शेष मिथक है भ्रांत
Friday, January 1, 2016
Wednesday, November 18, 2015
Friday, November 6, 2015
धर्म
काटी ली द्रोण ने
उंगली एकलव्य की
दिया श्राप परशुराम ने
शिष्य कर्ण को
दोनों थे गुरुभक्त
दोनों बलशाली
थे दोनों योग्य
शायद अधिक
अर्जुन से भी
क्या धर्म था यही
या जीत जाति की
धर्म पर
Tuesday, November 3, 2015
तस्वीर
सांझ
ढले मेरी आँखों में
तस्वीर
सी इक खिंच जाती हैअनदेखी अनजानी सी
टेढ़ी मेढ़ी रेखाओं के जालों सी
खूब वो
मन को भाती है जब
इन्द्रधनुष
की सतरंगी पोशाकों मेंझिल मिल तारों की कुटिया से
वो झांक मुझे मुस्काती है
वसंत
पुष्प के अधरों सी
नदिया
के निर्झर निनाद सीभोर किरण की लाली सी
जब मन पर छा जाती है
मैं भाव
कुंज में खो जाता हूँ
स्मृति के तारों से झंकृतगीत वो फिर दोहराता हूँ
गीत वो फिर दोहराता हूँ
(२९ वर्ष पुरानी रचना (१९८५)
Monday, November 2, 2015
भिखारी
भिखारी
ढीठ
माँग रहा था
एक रुपया
वो भी
मंत्री जी से
दुलत्ती खाई
था इसी लायक
भिखारी
मंत्री जी
ढीठ
फिर आयेंगे
माँगने वोट
करेंगे वही सलूक
हम भी
जो करता है
एक भिखारी
दुसरे भिखारी
के साथ
Sunday, November 1, 2015
गिद्ध
गिद्ध
इंतज़ार मेंइंसान के
मरने का
नहीं खाएगा
जब तक
ज़िंदा है वो
इंसान
बेसब्रहर वक़्त
दबोचता
मारता
खाता
इंसानियत को
कार्यक्रम
और भाइयो बहनो
स्वागत कीजिये
तालियों से ज़ोरदार
अगले कलाकार
जिनके लिए
बेसब्र हैं आप
मत जाइए आप
इनकी कद काठी
या उम्र पर
देख लिये थे
पालने में ही
इनके पाँव
इनके पापा ने
फिर तेरह वर्ष
किया कड़ा श्रम
अब निखरी है
प्रतिभा इनकी
खरे सोने जैसी
तो भाइयो और बहनो
बाँध लीजिये अपनी
कुर्सी की पेटी
लीजिये गहरी साँसे
झपक लीजिये
अपनी पलकें
आ रहे हैं
अगले कलाकार
विकास
तीन, दो
और, और, और
एक
अरे यह क्या
कहाँ है
विकास
विकास के पापा
भेजिये न
मंच पर उसे
क्या बात है
विकास इतना
डरा क्यों है
क्षमा करें
भाइयो
और बहनो
विकास
ढ़ीठ, मनमाना
जिद्दी हो गया है
नहीं आएगा
हमारे साथ
मंच पर
ऐतराज़ है
उसे मेरे आपके
खाकी निकर पर
बौरा गया है
यह नहीं जानता
हम कौन हैं
हमारा इतिहास
संस्कार
संस्कृति
बिक गया है
शायद यह भी
दुश्मन के हाथों
मूढ़
गद्दार
विकास
चलता रहेगा
यह कार्यक्रम
विकास के बिना
स्वागत कीजिये
तालियों से ज़ोरदार
अगले कलाकार
जिनके लिए
बेसब्र हैं आप
मत जाइए आप
इनकी कद काठी
या उम्र पर
देख लिये थे
पालने में ही
इनके पाँव
इनके पापा ने
फिर तेरह वर्ष
किया कड़ा श्रम
अब निखरी है
प्रतिभा इनकी
खरे सोने जैसी
तो भाइयो और बहनो
बाँध लीजिये अपनी
कुर्सी की पेटी
लीजिये गहरी साँसे
झपक लीजिये
अपनी पलकें
आ रहे हैं
अगले कलाकार
विकास
तीन, दो
और, और, और
एक
अरे यह क्या
कहाँ है
विकास
विकास के पापा
भेजिये न
मंच पर उसे
क्या बात है
विकास इतना
डरा क्यों है
क्षमा करें
भाइयो
और बहनो
विकास
ढ़ीठ, मनमाना
जिद्दी हो गया है
नहीं आएगा
हमारे साथ
मंच पर
ऐतराज़ है
उसे मेरे आपके
खाकी निकर पर
बौरा गया है
यह नहीं जानता
हम कौन हैं
हमारा इतिहास
संस्कार
संस्कृति
बिक गया है
शायद यह भी
दुश्मन के हाथों
मूढ़
गद्दार
विकास
चलता रहेगा
यह कार्यक्रम
विकास के बिना
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दस्तक
दस्तक देता रहता है कि सुन सके अपनी ही दस्तक "मैं" मैं को शक है अपने होने पर मैं को भय है अपने न होने का
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बनने से संभव नहीं है होना होना तो संभव है होने से ही होने की राह नहीं चाह नहीं होने का यत्न नहीं प्रयत्न नहीं होना तो हो रहना...
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कुश, कुश पर पिंड पिंड पर तिल, पुष्प, जल, भोग अर्पित कर सविधि श्राद्ध किया "मैं" का मैंने हे प्रभु "मैं" की मुक्ति हो ...
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इस साल कुछ पाना नहीं है खोज लेना है बस गुमशुदा खुद को। इस साल कहीं जाना नहीं है लौट आना है बस यहाँ, अभी। इस साल कुछ बनना नहीं है ...

