Saturday, July 19, 2014

तो यह न होता

आज अख़बार में छपा है
टीवी पर चर्चा भी हो रही है
मेरे बारे में
नहीं मेरे रेप के बारे में

कुछ लोग क्षोभित हैं
कुछ क्षोभ जता रहे हैं
कुछ कहते है सरकार है दोषी
पर मैं जानती हूँ सरकार नहीं थी वहाँ
सरकार कहीं नहीं थी
होती तो यह न होता



वो मेरा नाम नहीं लेते
रेप के बाद नहीं रहता नाम
न रहती है उम्र
बच्ची बन जाती है महिला
कोई कल नहीं होता
रह जाता है केवल एक कल
केवल एक कलंक

कुछ कहते हैं कोई और दोषी है
पर इसका पता एक ब्रेक के बाद चलेगा
तब तक आप विज्ञापन देखिये
रंगीले पानी का विज्ञापन
रंगीले पानी में आम नहीं है
पर विज्ञापन में आम है
एक अभिनेत्री भी है
वो आम नहीं है
शायद वो आम खा रही है
अभिनेत्रियां ऐसे ही खाती है
इसीलिए आम को भाती है

आम जो कभी कभी
मोमबत्तियाँ भी जला लेते हैं

विज्ञापन ख़त्म
चर्चा में नए लोग आ गए
पिछलों को जाना था दूसरे स्टूडियो
जहाँ से ये नए लोग आये है
ये कहते हैं समाज का दोष है
पर समाज कहाँ था
वहाँ नहीं था
होता तो यह न होता

अब चर्चा जोरों पर है
कुछ लोग क्रोधित हैं
कुछ क्रोध जता रहे हैं
कुछ चिल्ला रहे हैं
कुछ की नज़र टी आर पी पर है
यह चर्चा मेरे बारे में है
नहीं मेरे रेप के बारे में है
पर मैं कहाँ हूँ इस चर्चा में
मैं कभी नहीं होती
होती तो यह न होता




भिखारी

काँच के उस ओर खड़ा
वह जीव कौन सा है
दीखता मानव सा
डरावना भूखा

क्या सच में है भूखा
या स्वाँग है
दूँ या ना दूँ
छोटा है
कौन सा गुनाह

चलो बत्ती हरी हुई
चीख़ने लगी गाड़ियाँ
और उनके अंदर बैठे जीव
सारे मानव से
डरावने भूखे

Friday, July 18, 2014

बलिदान

नहीं होगा तम ख़त्म तारो के दम पर
सूरज को तिल तिल खोना ही होगा

कीचड के कतरों से कतराएं कब तक
ये मंदिर किसी को तो धोना ही होगा

Monday, July 14, 2014

कंधे

कंधे
चलते दौड़ते
थमे कुछ
चले लेकर
ठहरी साँसों को
लिपटा कर
लपटों में
फिर लगे
चलने दौड़ने
कंधे

सत्य

ऐ सत्य मैंने देखा है तुम्हें
जीवन की पहली किलकार में
और मृत्यु की ठहरती रफ़्तार में

सुख

साधन में सुख खोजता खुद ही खोता जाय
खुद में खोया साधु जो सुख में सो उतराय

एक परिभाषा कविता की

मिश्री मीठी तप्त अंगीठी
मरहम लेप कटु आक्षेप
तरल सतह की गूढ़ थाह
अल्प वाक्य अतिशय प्रभाव

दस्तक

दस्तक देता रहता है कि सुन सके अपनी ही दस्तक "मैं" मैं को शक है अपने होने पर मैं को भय है अपने न होने का